पृथ्वी

पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाकर प्रेम दिखाती है
बिन मांगे अपनी झोली हमेशा ही भरा पाती है
हर चीज समय से जुड़ी है प्रत्येक जगह यहां
जलीय चक्रीय प्रवृति से भरा है सारा ही जहां

इसकी तरह ब्रह्मांड की हर चीज ही है गोल
मानव मन उलझ जाता पर न पाता उसे तौल
स्वाभाविक रूप से सक्रिय है प्रकृति जिसकी
हर सजीव में झलकती है गतिशीलता भू की

अपने अस्तित्व के कारण ही हम सब हैं जुड़े
समय कब है थमा हमारा हर छोर इसपे खड़ा यहां बैठे हैं इसकी गोद शायद कुछ बचा हिसाब
ईश्वर के पास है सबके सकल कृत्य की किताब

Comments

5 responses to “पृथ्वी”

  1. बहुत खूब, बहुत सुन्दर

  2. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    अतिसुंदर

  3. Suman Kumari

    अपनी वसुनधरा का सजीव चित्रण!

  4. Geeta kumari

    बहुत सुंदर चित्रण

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