प्रभात का संदेशा

बह रही पवन ,खिल रहे सुमन,
कितना अदभुद यह नजारा है,
छंट गया तिमिर, बीती यामिनी,
रवि की किरणों ने पैर पसारा है।
नभ में चिड़ियाँ,कलरव करतीं,
गुंजन यह मधुरिम छाया है,
आलस्य त्याग हे मनुज जाग
पूरब से संदेशा आया है,
धरती का आंचल महक रहा,
नूतन यह सवेरा आया है,
करें धन्यवाद उस ईश्वर का,
जिसने संसार रचाया है,
जिसने संसार रचाया है।

Comments

9 responses to “प्रभात का संदेशा”

  1. करे धन्यवाद उस ईश्वर का जिसने संसार रचाया है ।बहुत ही सुंदर पंक्तियां अमिता जी

  2. Satish Pandey

    बह रही पवन ,खिल रहे सुमन,
    कितना अदभुद यह नजारा है,
    छंट गया तिमिर, बीती यामिनी,
    रवि की किरणों ने पैर पसारा है।
    —— प्रातःकाल की सुंदरता का अद्भुत चित्रण

  3. Geeta kumari

    आलस्य त्याग हे मनुज जाग
    पूरब से संदेशा आया है,
    धरती का आंचल महक रहा,
    नूतन यह सवेरा आया है,
    _____ प्रातः काल के सौंदर्य का बहुत ही सुंदर शब्द चित्र प्रस्तुत किया है आपने एकता जी। बहुत ख़ूब

  4. प्रातः काल का सुंदर वर्णन किया है आपने

  5. Susheel Kumar

    Bahut sunder rachman hai

  6. Susheel Kumar

    वाह क्या बात है बहुत सुन्दर रचना 👌🌹🙏

  7. Raunak Srivastava

    Sundar rachna

  8. vikash kumar

    great

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