“प्रेम रूपी कल्पवृक्ष”

तेरे नैनों से प्रेम की
बरसात हो गई
लड़ झगड़ के देखो
मेरी रात हो गई
प्यार में हार गए हम सौ दफ़ा
क्या करें अब तो जमानत भी जप्त हो गई
सावन में बौर आया लद गया हर वृक्ष
मैं प्रेम रूपी कल्पवृक्ष का अवतार हो गई।।

Comments

4 responses to ““प्रेम रूपी कल्पवृक्ष””

  1. Praduman Amit

    वाह। प्रेम रस की बरसात हो रही है आपकी बेहतरीन रचना में

    1. धन्यवाद 

  2. बहुत सुंदर

    1. धन्यवाद 

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