प्रेम वह है
जो आंखों में, मन में
दूजे के प्रति उमड़
चाहत के बीज उगा देता है,
विरक्त और बुझे मन में,
तत्क्षण अनुराग जगा देता है।
प्रेम वह है
जो सिंचित कर,
मन के मुरझाये पौधों को
हरा-भरा कर देता है।
प्रेम वह है
जो नयनों में
नव दृष्टि,
नव ज्योति जगा देता है।
प्रेम वह है
जो अवचेतन भावों को
जाग्रत कर
नवचेतना जगा देता है।
प्रेम वह है
जो खुशी का संचार कर देता है,
जीने का नया
उत्साह भर देता है।
प्रेम वह है
जो नव सृजन को
प्रेरित कर देता है,
नवसृजन से खुद का होना
अंकित कर देता है।
——– डॉ0 सतीश चन्द्र पाण्डेय
प्रेम वह है
Comments
5 responses to “प्रेम वह है”
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वाह क्या बात है।
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बहुत खूब
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उम्दा रचना
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सुंदर व सटीक परिभाषा दी है आपने
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Very good sir
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