फर्ज अपना निभाते चल

फर्ज अपना
निभाते चल ओ राही,
बोल उत्साह के
सुनाते चल ओ राही।
दुःखी के पोछ आँसू
जरा सा दे सहारा,
गमों को दूसरों के
मिटाते चल ओ राही।
हर तरफ दुख ही दुख है
बड़ी विपदा खड़ी है,
कई घर लुट गए हैं,
घड़ी संकट भरी है,
नहीं अब टूटना है,
तुझे तो जूझना है,
थके हारे को हिम्मत
दिलाते चल ओ राही।
समझ पाया नहीं है
अगर कोई अभी तक,
उसे सारी हकीकत
बताते चल ओ राही।
जरा सा सावधानी
सभी रख लें समझ लें
जीत पायेंगे पक्का
बताते चल ओ राही।
—– डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय।

Comments

5 responses to “फर्ज अपना निभाते चल”

  1. Praduman Amit

    बहुत ही भावपूर्ण रचना है।

  2. राकेश

    अति सुंदर भाव

  3. बहुत सुन्दर रचना प्रस्तुति 

  4. बहुत सुंदर रचना 

  5. Amita Gupta

    थके हारे को हिम्मत दिलाते चल ओ राही,
    बहुत सुंदर रचना प्रस्तुति है आपकी 🙏🙏

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