“फागुन आया”
फागुन आया चल रंग श्रृंगार कर ले।
अपने तन मन को रंग प्रेम व्यापार कर ले
रंग ले आज तु यह जग सारा,
आया रंगो का मौसम रंगीला,
उड़ा-उड़ा गुलाल नाचती गोपियां,
देख रास करती कृष्ण संग लीला,
बजा बासुरी और स-स्वर श्रृंगार कर ले।
अपने तन मन को रंग प्रेम व्यापार कर ले।
तु गोपियों का मन मोहन।
भौरा बन झुम वृन्दा वन।
रस ले सुमन| यौवन का तु
कामदेव का ले पुष्प सम्मोहन।
लय न हो फिर भी कोई गीत संचार कर ले।
अपने तन मन को रंग प्रेम व्यापार कर ले।
गा तु आज नव गीत फाग,
नाच नचा इन वृजबाला को,
रंग दे अपने रंग प्रेमरंग से,
इन अनछुई नव बाला को,
दिवास्वप्न ले उसे चल साकार कर ले।
अपने तन मन को रंग प्रेम व्यापार कर ले।
योगेन्द्र कुमार निषाद
घरघोड़ा, छ०ग०
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