फिर-फिर तुझको तोल रहा हूँ
प्रियतमे तेरे स्वरूप का
कैसे वर्णन करूँ अब मैं,
सब उपमान सुंदरता के
आ गए पूर्व की कविता में।
काले बादल से सुन्दर बाल,
कमल की पंखुड़ियों से गाल,
झील सी आंख, शुक की सी नाक
हाथी सी मदमाती चाल ।
चाँद सा चेहरा, कोयल सी बोली
इन सब में अब तक तू तोली ,
फिर-फिर तुझको तोल रहा हूँ
तुला पुरानी है घटतोली।
अज्ञेय कह गए थे यह सब
उपमान हो गए मैले अब,
तब भी मैं इन उपमानों से
तुझे सजाता हूँ अब तक।
तेरी सुंदरता पर अब तक
मैं खोज न पाया नए शब्द
जिससे निस्तेज रही कविता
कलम रही मेरी निःशब्द।
WAAH
सादर धन्यवाद विवेक जी
वाह, और क्या चाहिए।श्रृंगार रस से सजी सुंदर रचना।
सादर धन्यवाद जी
Sir, aap bhi pratiyogita wali kavita daaliye
जी विवेक जी, कोशिश करता हूँ। सादर धन्यवाद
Osm
सादर धन्यवाद
अज्ञेय की ‘कलगी बाजरे की’ की कविता का सुंदर उद्धरण
जी धन्यवाद
nice
सादर धन्यवाद जी
वाह वाह बहुत सुंदर
सादर धन्यवाद