फूल तुम्हारा शुक्रिया

मेरे गतिशील पैरों को
आखिर तुमने रोक लिया
फूल तुम्हारा शुक्रिया
नतमस्तक हूँ
तुम्हारे निश्छल स्वभाव के सामने
थकी उबी आँखो के तारा हो तुम
हिरण की तरह उछलने वाले मन को
ठहरे हुए जल की तरह स्थिर कर दिया
जान कर खुशी हुई कि तुम जलते
नहीं हो
तुम्हारी अहंकार शून्यता तुम्हें सर्वाधिक सुंदर बनाती है
तुमने इंसानियत को जिंदा किया
तुम्हारे स्पर्श से
भगवान् भाते हैं
प्रदूषण के जमाने में सुगंध दिया
फूल तुम्हारा शुक्रिया

Comments

5 responses to “फूल तुम्हारा शुक्रिया”

  1. Pragya

    बहुत ही सुंदर शब्दों के माध्यम से आपने फूल की महिमा को व्यक्त किया है सचमुच बहुत ही सुंदर कविता है जितनी तारीफ की जाए कम है..

  2. ऐतिहासिक रचना

  3. अतिसुंदर भाव 

  4. Amita

    उम्दा लेखन

  5. Ekta

    बहुत सुंदर प्रस्तुति

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