फौलादी मन
किसी शाख कि मोहताज नहीं हूँ साहब
जमींर जिन्दा हैं मेहनत करके खाता हूँ
बैसाखी का नंगा नाच करके क्या हैं फायदा
मुझे अपने ऊपर हैं चट्टानो सा भरोसा
मेरी खुद्दारी का हाल तुम जानकर क्या करोगे
मेरी झोली में जितना हैं मैं उसी में खुश हूँ
कटोरे पकड़ मैं भी माँग कर गुजारा कर लेता
जमीं ही मेरी गवाही ना दी भीख की निवाले को
तरस खैरात की रोटी नहीं हैं कमाना
बैसाखी का बहाना बना नहीं पकड़ना हैं कटोरा
बाजू में दम हैं हिम्मत में हैं हौसला
मैं विकलांग हूँ तन से मन से मैं फौलादी
खुश हूँ खुश रहता हूँ मदमस्त जीता हूँ
परिवार कि जिम्मेदारी हौसले से पुरा करता हूँ
रोटी की निवाले को बाँट कर खा लेता हूँ
अपने जमींर को मैं कभी गिरने नहीं देता हूँ
महेश गुप्ता जौनपुरी
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