वो लोट-पोट हो रहा था
जमीन पर,
जिस तरह केंचुआ
तिनके से छूने पर
फड़फड़ाने लगता है,
वैसे वह बेचैनी से
फड़फड़ा रहा था।
किसी का तो बेटा रहा ही होगा
अब इस तरह
नशे का आदि होकर
भरी सड़क में
लेटा उलट-पुलट कर रहा था।
चिल्ला रहा था
सिर पीट रहा था,
नशे से शुष्क हो चुका
उसका दिमाग
उसके नियंत्रण में नहीं आ रहा था।
शायद आज या तो
डोज कम हो गई थी,
या नशा नहीं मिल पाया था।
लेकिन जो भी था
नशे ने एक इंसान को
सड़क पर लिटा दिया था,
आज उसको पूछने वाला
कोई नहीं था,
बस वो अकेला
तड़पने में लगा था।
फड़फड़ा रहा था
Comments
6 responses to “फड़फड़ा रहा था”
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यथार्थ का चित्रण। नशा वाकई सब कुछ छीन लेता है।
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यथार्थ शब्द चित्र
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True poem
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नशे के दुष्परिणाम बताती हुई यथार्थ रचना
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ऐसा ही होता है जब लोग नशे में चूर हो खुद को बर्बाद करते हैं
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बहुत खूब
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