बंद खिड़कियों का शहर

यारों ! ये कैसा कहर हो गया।
बंद खिड़कियों का शहर हो गया।।
बाहर बीमारी, भीतर लाचारी
देख आबोहवा भी जहर हो गया।।
मुँह पे पट्टी चढ़ी, पेट में खलबली
दवा संग दुआ भी बेअसर हो गया।।
काम धंधा गया, सब मंदा हुआ
दिन गिन गिन आठों पहर हो गया।
सुन विनती प्रभु, विनयचंद की तू
हर संकट सभी जग जबर हो गया।।

Comments

8 responses to “बंद खिड़कियों का शहर”

  1. राकेश पाठक

    Berynice

  2. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    बहुत बहुत धन्यवाद

  3. Nice  line🙂

  4. Aapka likha Har EK Shabd Moti ke Saman lag raha hai bahut hi Sundar Shabd Rachna

    1. बहुत बहुत धन्यवाद 

  5. Ekta

    बहुत सुंदर लेखन

  6. Amita

    ईश्वर हम सभी को इस संकट की घड़ी से जल्द उबारे

  7. अति सुन्दर रचना

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