बचपन से ही जीवन के रंग में,
मैं धीरे धीरे ढ़ल लेती थी,
छोटे छोटे पैरों से अक्सर,
मैं खुद अपने दम पर चल लेती थी,
रिश्तों की एक मोटी चादर को,
मैं साँझ सवेरे बुन लेती थी,
अपने सम्बंधों की माला में,
मैं फूल चुनिंदा चुन लेती थी,
झोंका एक हवा ने मेरे,
ख़्वाबों को जब भी रौन्ध दिया,
अपने अंतर्मन की आवाज़ों को,
मैं सोती रातों में सुन लेती थी,
लोगों की बातें ज्यों मेरे,
दिल की दीवारों पर लगती थी,
दृढ़ निश्चय की आशा लेकर,
मैं आसमान में उड़ लेती थी।।
राही (अंजाना)
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