जल की बूॅंदें गिरी सारी रात,
रात भर होती रही बरसात।
तिमिर छाया रहा भोर में भी,
ऐसे हो गये थे हालात।
ना चन्द्र दिखे ना सूर्य ही आए,
मोती गिरते रहे सारी रात।
भीग गया धरा का ऑंचल,
भीग गये सब पुष्प और पात।
नभ से बूॅंदें गिरी सारी रात,
ऐसी हुई जल की बरसात॥
______✍गीता
बरसात की रात
Comments
8 responses to “बरसात की रात”
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बहुत सुंदर और उच्चस्तरीय प्रस्तुति है गीता जी, लेखनी में अदभुत क्षमता है।
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समीक्षा के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद सतीश जी
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बहुत खूब
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बहुत-बहुत धन्यवाद रोहित जी
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उच्चस्तरीय रचना
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बहुत-बहुत धन्यवाद सर
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बहुत सुंदर रचना
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बहुत-बहुत धन्यवाद भाई जी
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