गर कोई मुझसे पूछे कभी
बता मन तेरा बसता है कहीं
झट से मैं बोल दूं
मगधेश की गौरवमई परम्परा समेटे
है जहां बस वहीं।।
भोले भाले लोग जहां के
मेहनत नस नस में है सनी
स्वर्ग से भी सुंदर यह धरा
जिनके भलमानस से है बनी
हां धरा के उस भू-भाग पर ही
उल्लास की सुमन है खिली
मगधेश की गौरवमई परम्परा समेटे
है जहां बस वहीं।
जहां की बोलियों में मगही की मिश्री है घुली
कवि विद्यापति की गीतों की लगती है झङी
जहां जन्म ले आर्यभट्ट ने शून्य, गिनती में जङी
साक्षात् देव प्रभंजन से जिनकी अर्चन है जुङी
सर्वश्रेष्ठ शासन जनतंत्र की है जो जन्मस्थली
मगधेश की गौरवमई परम्परा समेटे
है जहां बस वहीं।
प्रकृति प्रदत्त है जिसकी अवर्णीय शोभा
दूर तलक दिखते बस खेत खलिहान हैं
अहिंसा की बीज जन्मी, जिस ज़मीं पर
जहां की मुख्य फसल मकयी गेहूं धान है
जन्मे जेपी जहां पर, जुड़ी गांधी की स्मृति
मगधेश की गौरवमई परम्परा समेटे
है जहां बस वहीं।
प्राण छूटे इस माटी पर,जुङे हर अरमान हैं
कुछ नहीं है पास मेरे, मन से धनवान हैं
पिछङा अशिक्षित गरीबी का तमगा है लगा
पर संतुष्ट होते हैं हमारे घर, चाहे जो मेहमान है
अभिमान है मुझको खुद पर है मेरी जन्मस्थली
मगधेश की गौरवमई परम्परा समेटे
है जहां बस वहीं।
बसता है कहीं
Comments
3 responses to “बसता है कहीं”
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बहुत सुंदर
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सच है
सुंदर है
लिखते रहें -

Nice
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