बस मेरा अधिकार हो

देह में अभिमान की गर्मी पड़ी
आसुंओं के स्रोत सूखे पड़ गये
नैन की झिलमिल सुहानी पुतलियां
आग के ओले गिराती रह गई।
बाजुओं की शक्ति से कमजोर की
कुछ मदद करने की चाहत खो गई
हर खुशी पर बस मेरा अधिकार हो
लूट लेने की सी आदत हो गई।

— डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत उत्तराखंड

Comments

13 responses to “बस मेरा अधिकार हो”

  1. Suraj Tiwari

    एक लाइन में क्या आपकी तारीफ़ लिखू
    पानी भी जो देखे आपको तो प्यासा हो जाये..।
    बहुत सुन्दर 💐💐💐💐💐💐💐

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद जी

  2. Satish Pandey

    धन्यवाद जी

    1. Satish Pandey

      धन्यवाद जी

      1. वेलकम

  3. Raju Pandey

    बेहतरीन 👌👌

    1. Satish Pandey

      बहुत सारा धन्यवाद

  4. Indra Pandey

    Waah

  5. Anita Sharma

    Waah sir bahut badiya

    1. Satish Pandey

      thanks

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