हर एक कविता
लिखता हूँ जो भी
लक्षित नहीं कोई
स्वयं लक्ष्य हूँ मैं।
किसी से नहीं है
अधिक प्यार मुझको
किसी से नहीं कोई
नफरत है मन में।
स्वयं की खुशी को
लिखता हूँ कविता,
अपने ही भीतर
बहाता हूँ सरिता।
ज्यादा किसी
लफड़े में पडूँ क्यों
स्वयं से ही मतलब
स्वयं पर ही कविता।
नहीं भूख ऐसी
पाऊँ सभी कुछ,
चलूँ राह अपनी
चिन्ता नहीं कुछ।
भागता सा जीवन
फुर्सत कहाँ है,
कविता है ऐसी
सुकूँ कुछ जहाँ है,
सुकूँ देती कविता में
उलझन क्यों पालूँ,
बहे काव्य सरिता
बाधा क्यों डालूँ।
—– सतीश चंद्र पाण्डेय
बहाता हूँ सरिता
Comments
13 responses to “बहाता हूँ सरिता”
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सुंदर भाव
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Thanks
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Very very nice
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Thanks
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शानदार
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बहुत धन्यवाद
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आपने सचमुच कविता की सरिता बहा बहा दी है।
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बहुत आभार
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अतिसुंदर भाव
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बहुत बहुत धन्यवाद
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क्या खूब कहा…
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आभार
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बहुत धन्यवाद
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