चले भी आओ मनमीत मेरे
बहार- ए-गुलशन बुला रहा है।
सजाई महफिल है प्रीत मेरे
बहार- ए-गुलशन बुला रहा है।।
नजरों के आगे तुम्हारा डेरा
धड़कनों में समाए हुए हो।
जस्न-ए-मुहब्बत करीब अपने
काहे को देरी लगाए हुए हो।
रस्म -ए-वफा के संगीत मेरे
बहार- ए-गुलशन बुला रहा है।।
बहार- ए-गुलशन बुला रहा है
Comments
13 responses to “बहार- ए-गुलशन बुला रहा है”
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wah
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धन्यवाद
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Bahut khub
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Shukria
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Nice
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Thanks
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Radhay Krishna
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Radhe Radhe
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सुंदर रचना
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धन्यवाद
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वाह
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वाह
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वाह
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