बाट

राधा ने सिर पर
धर मटकी
बैठी छांव तले
वट की
जोह रही है
श्याम को अखियां
दिन बीता अब
बीती रतियां
श्याम बिना निष्प्राण
है गैया
देख रही सुध खोकर
मैया
क्यों निष्ठुर तू
बना कन्हाई
क्या तनिक भी
मेरी याद न आई।
       वीरेंद्र सेन प्रयागराज

Comments

6 responses to “बाट”

  1. बेहद रोचक व शानदार शिल्प
    प्रेम की विरह का अनूठा रसपान कराती हुई रचना

  2. Geeta kumari

    कान्हा जी को याद करती हुई, राधा जी के मनोभावों को खूबसूरती से दर्शाती हुई अति सुंदर एवम् रोचक कविता

    1. Virendra sen Avatar

      आपका आभार

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