हम काटते ही नहीं ,
बुराइयों की जड़ें,
पालते हैं ,पोषते हैं ,
कभी इच्छाओं के लोभ से,
कभी रूपयों की चाह से,
जब लगता है ,
वह जड़े हमें बांधती है,
हम उठ खड़े होते हैं,
अपने विचारों के ;औजार लेकर
दौड़ते हैं, काटते हैं ,
जब क्षमता होती नहीं ,
हमारे भीतर; उसे मिटाने की..
बुराइयों की जड़े
Comments
10 responses to “बुराइयों की जड़े”
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Sunder
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धन्यवाद सर
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बहुत ही बेहतरीन
बहुत अच्छा संदेश देने का सफल प्रयास-

बहुत बहुत धन्यवाद सर
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समाज का यथार्थ चित्रण। सुन्दर प्रस्तुति
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बहुत बहुत धन्यवाद
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Nice
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Thank you
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sundar
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धन्यवाद
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