बेटियां घटने लगी हैं

फ़िक्र कर इस बात की
कि बेटियां घटने लगी हैं,
ख़तरा है मानव जाति पर
यह घंटियाँ बजने लगी हैं।
छेड़ना प्रकृति को
महंगा पड़ा है ,
सभ्यता पर दाग
गंदला सा लगा है।
—– डॉ. सतीश पांडेय

Comments

5 responses to “बेटियां घटने लगी हैं”

  1. शोचनीय….यदि ऐसा है तो बहुत ही दुखद है। कविता के माध्यम से समाज की सोच बदलने की ताकत है आपकी लेखनी में

    1. जी सादर आभार

    1. धन्यवाद जी

  2. सहज और दु:खद स्थिति पर रचना

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