पापा की परी होती है बेटियां
मन की खरी होती है बेटियां
पापा बेटियों के लिए,
ज़मीं आसमां एक कर दें
क्योंकि एक पिता का
गुमान होती है बेटियां
हर किसी के घर की
शान होती है बेटियां
आंखें नम हो जाती है मां-बाप की,
उंगली पकड़कर चलना सिखाया था,
डोली में बैठकर
फ़िर चली जाती है बेटियां
छोटा सा सफ़र है बेटियों के साथ,
फिर तो पकड़ लें वो
अपने पिया जी का हाथ
बहुत ही कम वक्त के लिए
रहती है बेटियां
एक दिन ससुराल चली जाती हैं बेटियां
______✍️गीता
बेटियां
Comments
10 responses to “बेटियां”
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बेटियों पर आपने बहुत ही अच्छा और शानदार लिखा है
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बहुत-बहुत धन्यवाद संदीप जी
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बहुत खूब सुंदर
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बहुत-बहुत धन्यवाद भाई जी🙏
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बेटियों पर बहुत उच्चस्तरीय और लाजवाब रचना है। कवि ने यथार्थ भाव प्रकट किए हैं। कथ्य और शिल्प दोनों ही बेहतरीन हैं। बहुत खूब
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सुन्दर समीक्षा हेतु बहुत बहुत धन्यवाद सतीश जी 🙏
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धन्यवाद भाई
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सुंदर रचना बेटियों पर
सचमुच बेहद प्यारी होती हैं-
बिल्कुल प्रज्ञा। समीक्षा के लिए धन्यवाद
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