बोलूँ कैसे बात

चुप रहना आता नहीं, बोलूँ कैसे बात,
चावल पककर बन गया, गीला गीला भात,
गीला गीला भात, हर तरफ पानी पानी,
सूखे सूखे होंठ, और मन में नादानी,
कहे लेखनी बात समझ मन तू जा अब छुप,
कर अनदेखी आज बोल मत हो जा तू चुप।

Comments

4 responses to “बोलूँ कैसे बात”

  1. लाजवाब अभिव्यक्ति

  2. Geeta kumari

    छंद युक्त शैली में लिखी गई,बहुत सुंदर कविता, उत्तम लेखन।
    ,”चावल पककर बन गया, गीला गीला भात,
    गीला गीला भात, हर तरफ पानी पानी,”
    _____जीवन की परेशानियों को दर्शाती हुई बहुत ही सुन्दर और सहज रचना

  3. बहुत ख़ूब

  4. क्या बात है सतीश जी, लाजवाब अभिव्यक्ति

Leave a Reply

New Report

Close