बड़े दिनों मैं कुछ फुर्सत सी मिली हैं,
कलम फिर हाथ में लेने की, चाहत सी हुई है।
कोई मंज़र घटा या फिर कोई बात हुई?
या फिर दुनियां ए दस्तूर लिखने की चाहत हुई,
क्या उनकी रहनुमाई कुछ असर कर गयी,
जो हमपर फिर गालिबी उत्तर आई।
या फ़िर गुफ़्तगू मैं कुछ ख़ालिस रह गयी,
या जुगनू से चमकने की ख्वाइश कुछ,
अधूरी सी रह गयी।
क्या चाँद की चांदनी मैं कुछ खलल सा पड़ा है,
या सितारों की चमक मैं कुछ दखल सा पड़ा है,
क्या कोई आंधी, पेड़ से पत्ते उड़ा ले गयी,
या फिर बदली को, बहारें ले उड़ी।
ये दिल मैं दावानल फिर से, उठा क्यों है?
मैं खामोश हूँ,कुछ इस कदर,
पर मेरे दिल मैं उस सुनामी का असर क्यो है?
ऐ ज़िन्दगी कुछ तो सच बता,
सफर के हर मोड़ पर,तेरा इंतज़ार,तेरे हमसफ़र होने पर,
मुझे ऐतबार क्यो है?
बड़े दिनों मैं कुछ फुर्सत सी मिली हैं
Comments
2 responses to “बड़े दिनों मैं कुछ फुर्सत सी मिली हैं”
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बहुत खुब
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वाह
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