भूल गयी खुद को
बनी बनायी राहों पर चलते-चलते
भूल गयी खुद को, औरों की सुनते-सुनते ।
ज़मीर जिसकी गवाही न दे, क्यूँ बढे अबूझ चिन्हों पर
अच्छी बनकर, खुद से लङकर, सह गयी डरते-डरते ।
अपमान का विष, कब तक पान करूँ
कब तक मूक-चीख से प्रतिकार करूँ
थक गयी, संघर्ष की घङियो से, रार करते-करते ।
खुद को कैसे मशगूल रखू, कबतक आखिर धीर धरूँ
रोजमर्रा की बात है ये,आखिर कैसे वहन यह पीङ करूँ
बिखरी आशाओं की लङियाँ, टूट गये सब सहते-सहते ।।
बेबस और गृहस्थ नारी अपने जीवन की विसंगतियों से जब बुझिल होकर टूटती है तो कुछ इसी प्रकार टूटती है उसे अपने आंचल से सभी को प्यार दुलार देना पड़ता है बच्चों को बड़ा करना पड़ता है और एक वृक्ष की तरह अपने हर रिश्ते को पुष्पित फलित करना पड़ता है परंतु जीवन की इस उधेड़बुन में उसकी स्वयं की ख्वाइश है उसका अस्तित्व नष्ट हो जाता है उसे तमाम प्रकार के असहनीय कष्ट झेलने पड़ते हैं और जब वह अत्यंत पीड़ित हो जाती है तो वह कुछ इसी प्रकार कहती है अपमान का विष कब तक पान करूं
बहुत खूब सुमन जी
सादर आभार
अतिसुंदर भाव
सादर आभार