कयी प्रश्न है मानस पर उभरे
यहाँ दस्तूर भी हैं कैसे-कैसे
अपने भी हैं क्यूँ पराए जैसे
माँ-पापा ने भरपूर स्नेह दिया
फिर क्यों कर खुद से दूर किया
जन्म दिया, पालन पोषण करके
क्यू किसी और के हाथों सौंप दिया
यहाँ सभी हैं अनजाने,इनके मन में कैसे झांके
सबकी है उम्मीद बङी,नन्ही गुङिया मजबूर खङी
मजबूर खङी
Comments
5 responses to “मजबूर खङी”
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बहुत खूब
विचारणीय विषय-
सादर आभार
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आखिर कौन है जो ये दस्तूर बनाया।
पत्नी बनकर रहे घर में मजबूर बनाया।।
मैं बापू के घर में रहूँगी भाई जाएगा ससुराल।
ऐसे दुनिया कब बदलेगी सदा रहेगा वही हाल।।-
बहुत बहुत धन्यवाद सर
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बहुत सुंदर रचना
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