मदहोश शाम

ऐ ढलती शाम, ऐ लालिमा बड़ा ताज्जुब है
मिजाज के ऐसा तू कभी रंगीन न था
बला तो सही उनके दीदार के बाद
तू इतना रंग बिरंगी कैसे हो गया।
सूरज तो बेचारा इमान से कभी के ढल गए
हम भला उसे क्या दोष दे, क्या शिकायत करे
जरूर तुझ में ही कहीं न कहीं बेईमानी है
तभी तो आज हद से ज्यादा तू रंगीन हो गया है ।
कहे अमित ऐसे न बिखेर तू अपनी रंगीन शाम
कसम है तुझे इस खुबसुरत नीले गगन की
सिन्हे पे सुंदरता की खंजर फेंकने वाले
बता तो सही तेरी सुंदरता की राज क्या है।

Comments

3 responses to “मदहोश शाम”

  1. सुन्दर रचना

    1. Praduman Amit

      धन्यवाद आप यों ही समीक्षा करती रहे।

  2. बहुत सुन्दर रचना प्रस्तुति 

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