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6 Comments

  1. बेहतरीन सर.. आपकी कविता ने मुझे मुनव्वर राणा की एक कविता स्मरण करा दी

    लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
    बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती

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