मां भारती

मां भारती वीणावादनी ये घाव कैसा है,
शब्दों की झुंझलाहट में फटकार कैसा है।
कण्ड से निकलते झूठ का ये भाव कैसा है,
ज्ञान की देवी मनुष्य का दुर्भाव ये कैसा है।।

✍महेश गुप्ता जौनपुरी

Comments

5 responses to “मां भारती”

  1. बहुत खूब

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