मां

( माँ )
सुबह उठते ही जब
सूरज की किरणें दिखाई देती हैं
चिड़िया चहचहा कर गीत सुनाने लगती हैं
माँ का मेरे प्रेम समर्पण होता हैं
ऊठ जा लल्ला सुबह हुयी
माथे को जब चुमती थी
यौवन में जब ऑखे खुलती
माँ याद बहुत आती हो
लोरी गा कर सीने से लगा
मुझे जब सुलाया करती थी
सोने के लिए अब मैं माँ
मोबाइल से खेलकर सोता हूँ
ना जाने बचपन मेरा
किस गली में खो गयी
माँ के साथ मेरा लड़कपन
कही खो गयी हैं
सुना देखता हूँ जब घर की चौखट
माँ याद बहुत आती हो
खाने के हर एक निवाले में
प्यार की खुशबू ढुढ़ता फिरता हूँ
सर पर हथेली को मैं माँ तेरे
दिन रात मैं तो तड़पता हूँ
घर की सुनी गलीयारो को
मैं एक टक देखता रहता हूँ
लाठी को जब देखता हूँ दरवाजे पर
माँ याद बहुत आती हो

Comments

3 responses to “मां”

  1. महेश गुप्ता जौनपुरी Avatar
    महेश गुप्ता जौनपुरी

    बहुत बहुत धन्यवाद

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