मातृभाषा

विविधता में एकता के सूत्र को सहजता से पिङोती जो
संस्कृत की बेटी, विविध भाषाओं की सहचरी है वो।
माँ सी ममता जिसके हर वर्ण में समाहित है
फिरन्गी भी जिसे सीखने को ललायित हैं ।
जो भारती के माथे पे बिन्दी बन सुशोभित है
जन- जन की भाषा देवनागरी लिपि से विभूषित है ।
रस, अलंकार, जैसे आभूषण हैं जिसके,
विभिन्न रूपों में दिखते अंदाज जिसके ।
जिसकी पहली शिक्षा माँ के आँचल से मिलती
लोङियो में जिसकी अभिव्यक्ति, गोद में होती
प्रेम, वात्सल्य, ममत्व, आत्मीयता की परिभाषा है
कोई और नहीं, हर जन की प्रिय अपनी हिन्दी भाषा है

Comments

9 responses to “मातृभाषा”

  1. बहुत सुन्दर रचना

    1. Suman Kumari

      सादर आभार

      1. वेलकम सुमन जी 🙏🙏🙏

  2. Pratima chaudhary

    हमारी हिंदी के लिए, बहुत सुंदर पंक्तियां

    1. Suman Kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद

    1. Suman Kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद शास्त्री जी ।

  3. Satish Pandey

    बहुत खूब
    प्रेम, वात्सल्य, ममत्व, आत्मीयता की परिभाषा है
    कोई और नहीं, हर जन की प्रिय अपनी हिन्दी भाषा है
    सुन्दर कविता, बेहतरीन पंक्तियाँ

Leave a Reply

New Report

Close