सुलग रही है प्रतिदिन ज्वाला
मानवता के पराली में
कायरता की राख छनेगी
कलयुग की इस जाली में
पसरा होगा बस सन्नाटा
मर्यादा की दहलीजो में
बिक जाएगी प्रेम अखंडता
नीलामी की चीजों में
बना हुआ था हर कोई कृतहन
तपोवन की इस भूमि पे
उड़ेली हुई है विश की प्याली
कर्म पथिक की धुली पे
कोई ना करता लाज शर्म
संबंधों को रखें ठोकर पे
जिनके पास थी विराट संपत्ति
संतान रखें उन्हें नौकर से
मानवता दहन
Comments
9 responses to “मानवता दहन”
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👏👏👏👏
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Thankyou
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Good
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Thanks 💐💐
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वेलकम
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Nice
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🙏🙏🙏
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Nice
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🙏🙏🙏
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