अमृत बेला है अतिपावन।
उठो रे तू छोड़ विभावन।।
हरि का सुमिरन कर लो रे।
सैर करो तू सुबह -सबेरे।।
शीतल मंद हवा सुखदाई।
योग प्रणायाम करो रे भाई।।
तन -मन को निर्मल कर लो।
मीठी वाणी मुख से बोलो।।
कर्मशील बन रोजगार करो।
दीनन हित परोपकार करो।।
मानव जनम न बेकार करो।
‘विनयचंद’ भव पार करो।।
मानव जनम न बेकार करो
Comments
3 responses to “मानव जनम न बेकार करो”
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“कर्मशील बन रोजगार करो।
दीनन हित परोपकार करो।।
मानव जनम न बेकार करो।
‘विनयचंद’ भव पार करो।।”
कवि शास्त्री जी की बहुत ही बेहतरीन पंक्तियाँ और उम्दा कविता है यह, यह कविता प्रेरणात्मक काव्य-बोध का निरंतर विस्तार करने में सक्षम है। -
“अमृत बेला है अतिपावन। उठो रे तू छोड़ विभावन।।
हरि का सुमिरन कर लो रे।सैर करो तू सुबह -सबेरे।।”
कहते हैं कि सुबह सुबह प्रभु अमृत वर्षा करते हैं,तो उस बेला में यदि सुबह की सैर की जाए और प्रभु भजन किया जाए तो यह सेहत के लिए वरदान समान है। इसी कथन को समझाती हुई कवि विनय चंद जी की बहुत सुंदर कविता-
शुक्रिया बहिन
विछावन होना था टंकन त्रुटि सुधार पाठक के ही हाथ में है
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