मुक्तक

1- है बहुत सख्त वक़्त के क़ैद खाने कि सलाखे,
जिन्दगी लाख बन जाए पंछी – मगर उड़ नहीं सकती ।

2- हकीकत से मुह मोड़ने का प्रयास तो देखो,
अक्सर आईने तोड़ दिया करते है लोग ।

3 – अपनी किश्ती को खुद ही संभल ए मुसाफिर ,
अक्सर मांझी बन कर साथ छोड़ दिया करते है लोग ।

Comments

4 responses to “मुक्तक”

  1. Anil Goyal Avatar
    Anil Goyal

    धन्यवाद

  2. राम नरेशपुरवाला

    Good

  3. राम नरेशपुरवाला

    सुन्दर

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