मुझे वरदान दो

कविता -मुझे वरदान दो
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वरदान दो वरदान दो
मुझे वरदान दो,
उठी है जो लहर मुझ में
हो विकट रूप जैसा
गति तेज सुनामी जैसा
साकार हो आकार हो
प्रकार हो ,मेरे ना विपरीत हो,
वह काम दो ,जिससे नाम हो
मेरे काम से पहचान हो,
ईश्वर तुझ से ही आशा है
ऐसा मुझे वरदान दो, वरदान……
तूफान के वेग जैसा
चिड़ियों के उड़ान जैसा
हमें दो ताकत ऐसी
गिद्ध में नेत्र ज्योति जैसी
आकाश में विस्तार जैसी
सरिता की धार जैसी,
पृथ्वी के धैर्य जैसा
मेरा पहचान हो ऐसी
ऐसा मुझे वरदान दो,
वरदान दो….
हो गंगा की लहर मुझ में
आप सबका पाप धूल जाए
हो ऊंचाई हिमालय सी
हवा शत्रु को रोक पाए
मातृभूमि की सेवा में
जीवन अर्पण कर जाएं
मेरा सुख सबके सुख में
सच्चा सुख मातृभूमि की रक्षा में
सबको प्यारा हो
ऐसा मेरा जीवन दर्शन हो, वरदान दो…
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**✍️ऋषि कुमार प्रभाकर

Comments

3 responses to “मुझे वरदान दो”

  1. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

  2. Geeta kumari

    सरिता की धार जैसी,
    पृथ्वी के धैर्य जैसा
    मेरा पहचान हो ऐसी
    ऐसा मुझे वरदान दो,
    वरदान दो….
    ___बहुत सुन्दर पंक्तियां हैं कवि ऋषि जी की , सम्पूर्ण कविता ही बहुत उत्कृष्ट भाव लिए हुए है । प्रभु से वरदान मांगती हुई बहुत बहुत उम्दा रचना । वरदान अवश्य मिलेगा, बहुत लाजवाब प्रस्तुति

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