भीग गई पूरी शैय्या
मेघा बरसे खूब,
अब मैं सोऊँ कहाँ, रहूँ कैसे।
यह पगडंडी, घर है मेरा,
नभ नीला ही, छत है मेरा।
आज जिसे है मेघ ने घेरा।
तड़-तड़ बरखा, तन में- मन में
अब मैं रहूँ कहाँ कैसे।
जो कुछ था सब
भीग गया है,
सिर पर डाले चदरिया
तन धरती पर बैठ गया है।
उठ कर जाऊँ कहाँ,
नहीं है कोई ठिकाना यहां,
अब मैं रहूँ तो कहाँ अब कैसे,
खाऊँ कैसे बिना पैसे।
मेघा बरसे खूब
Comments
2 responses to “मेघा बरसे खूब”
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एक निर्धन व्यक्ति के जज्बात और मनोदशा को कविता के माध्यम से दर्शाया गया है… कवि की पारखी नज़र और सहृदयता जीवन के हर छोर को परिलक्षित करती है…कविता में पैसे ना होने की मार्मिक अभिव्यक्ति भी है…..सुन्दर शिल्प और उत्तम भाव लिए हुए अति सुन्दर रचना
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अतिसुंदर रचना
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