8 Comments

  1. बहुत खूब प्रज्ञा ,अगर शीर्षक “मेरा आइना” ना रखती तो कुछ और ही समझ में आता, बहुत सुंदर कविता है ,सुंदर शिल्प । आइने के बारे में इतना सुंदर वर्णन ,बहुत ही शानदार प्रस्तुतीकरण

    1. धन्यवाद दी पहले शीर्षक कुछ और रखना चाहती थी ताकि सस्पेंस बना रहे पर उम्दा शीर्षक ना मिलने की वजह से सोंचा यही रखूं और सस्पेंस खत्म कर दूं

  2. मैंने शीर्षक पढ़ा नहीं था इस लिए मेरी उत्सुकता अंत तक बनी रही अंत में पता चला वह आईना है..
    बहुत अच्छी रचना

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