मेरी नन्ही सी गुड़िया
खिलौनों से खेलते खेलते
न जाने कब बड़ी हो गई!
आज जब देखी उसकी हाथों में चूड़ियां
सिर पर लाल चुनर
तो समझ में आया।
जो आंगन में फुदकती रहती थी,
दिन भर खेलती रहती थी,
अपने आगे पीछे सबको नचाया करती थी
बातों का खजाना रहता था जिसके पास,
अपनी नादान हरकतों से
सबको हंसाया करती थी।
वह गुड़िया आज इतनी बड़ी हो गई कि
उसे डोली में बिठाकर,
उसके सपनों के राजकुमार के साथ
विदा करने का वक्त आ गया है।
हां जी ! सच में मेरी गुड़िया बड़ी हो गई।।
मेरी गुड़िया बड़ी हो गई…
Comments
4 responses to “मेरी गुड़िया बड़ी हो गई…”
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बड़ी होती हुई बिटिया पर बहुत ही भाव पूर्ण,स्नेह पूर्ण और सुंदर रचना
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Thanks di
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बहुत खूब
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Tq
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