कविता – मेरे पिया परदेशी
(छंदबद्ध कविता)
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चारों ओर शरद की धूम मची देख सखी,
पिया मेरे आयेंगे न जाने कब तक अब।
बीती बरसात आँख सूख गई अब मेरी,
नींद नहीं चैन नहीं हर गई भूख मेरी।
बिना पिया काटी है ये बरसात भरी रात,
दूरभाष में भी नहीं हुई अब तक बात।
ऐसी व्याधि से भरा है संसार आज यह,
फिकर है मेरे पिया जाने कैसे होंगे तब।
जा री शरद की हवा देख कर आ तो जरा,
मेरे परदेशी पिया कैसे हैं किधर हैं।
मिलें यदि तुझे कहीं मेरे परदेशी पिया,
बता देना मेरी आँखें व्यथित इधर हैं।
———– डॉ0 सतीश पाण्डेय
मेरे पिया परदेशी
Comments
6 responses to “मेरे पिया परदेशी”
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बहुत हीं सुंदर छन्दबद्ध रचना है सर
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कवि सतीश जी की छंद बद्ध शैली में बहुत ही सुन्दर कविता है।
श्रृंगार में वियोग पक्ष में, विरहणी की व्यथा का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करती हुई बेहतरीन प्रस्तुति, लाजवाब अभिव्यक्ति । लेखनी को अभिवादन.. -

बहुत सुंदर रचना
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भूषण जी के छंदों की याद ताजा हो गई वाह पाण्डेय जी
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super
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अतिसुंदर
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