मेरे राम इतना तु कर दे मुझ पे एहसान
कि तेरा नाम जपूँ मैं बार-बार ।।2।।
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मेरे राम इतना तु कर दे मुझ पे एहसान
कि तेरा नाम जपूँ मैं बार-बार ।।1।।
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तेरे नाम बिन, मन हमें भरमाता
तू जिसे मिल जाये, उसे दुनिया से क्या लेना
राम तुम्हीं हो मेरे दाता,
मैं तेरे दर पे भिखारी बनके हूँ आया
दे दो चरण रज प्रभु जी,
बस यहीं कामना ये भिखारी करता ।।
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मेरे राम इतना तु कर दे मुझ पे एहसान
कि तेरा नाम जपूँ मैं बार-बार ।।2।।
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ये सारी सृष्टि तुझमें ही है समाई
ये जल,जीव, नभ तुझसे ही मुक्ति पाती
इस पापी, दुरात्मा को अंत समय तुझसे मिलने हो
मेरे राम मुझे तुझ से ही लगन हो ।।
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मेरे राम इतना तु कर दे मुझ पे एहसान
कि तेरा नाम जपूँ मैं बार-बार ।।3।।
जय श्री सीताराम ।।
मेरे राम इतना तु कर दे मुझ पे एहसान
Comments
3 responses to “मेरे राम इतना तु कर दे मुझ पे एहसान”
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बहुत सुंदर लिखते हैं विकास जी आप
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ये सारी सृष्टि तुझमें ही है समाई
ये जल,जीव, नभ तुझसे ही मुक्ति पाती
________ कवि विकास जी की बहुत श्रेष्ठ रचना, जय श्री राम -

मेरे राम इतना तु कर दे मुझ पे एहसान
कि तेरा नाम
जय श्री राम जय हो
लेखनी की
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