मेरे लिए

कब से उठाए बैठी हूँ अपनी घूंघट
उनके दीदार के लिए ।
एक वो है ख्वाबों में आशियाना तलाशते है मेरे लिए।।

Comments

3 responses to “मेरे लिए”

  1. बहुत खूब

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