मैं चाँद निचोड़ के लाया हूँ…

पलकों पर सजे थे सपनें
मैं थी नींद के आगोश में,
वो आया सपनों में मेरे
बोला मुझसे हौले से;
पी लो रानी! प्रेम का प्याला
मैं चाँद निचोड़ के लाया हूँ
तेरी खातिर आसमान से
तारे भी ले आया हूँ
मांग सजा दूं आ तेरी
मैं रंगीन सितारों से
तेरे आँचल में रख दूं
तोड़ के फूल बहारों से
रजनीगन्धा महकेगा
नित तेरी जुल्फों में
यह कहकर वो अदृश्य हो गया
मेरी सोई पलकों में,
जब खोली आँखें मैंने
अश्क जमे थे अलकों में……

Comments

5 responses to “मैं चाँद निचोड़ के लाया हूँ…”

  1. Geeta kumari

    अति सुन्दर कल्पना है प्रज्ञा जी की ,”पी लो रानी! प्रेम का प्याला
    मैं चाँद निचोड़ के लाया हूँ”,वाह सुन्दरता और प्रेम की पराकाष्ठा ! लाजवाब..

    1. बहुत बहुत धन्यवाद गीता जी भाव समझने के लिए एवं सुंदर समीक्षा के लिए

  2. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    अतिसुंदर भाव

  3. Anuj Kaushik

    पी लो रानी! प्रेम का प्याला
    मैं चाँद निचोड़ के लाया हूँ
    अति सुन्दर पंक्ति Pragya ji

Leave a Reply

New Report

Close