14 Comments

  1. मिथ्याओं पर आधारित
    है साहब ! सोंच तुम्हारी
    अब तो सारी बातें हैं
    लगती झूँठ तुम्हारी
    मेरी अभिलाषा का
    है तुमने जो उपहास किया…

    वाह! प्रज्ञा जी साहित्य को समर्पित अति सुंदर रचना….

  2. मेरी करुण व्यथा का
    है तुमने जो अपमान किया
    ना कभी माफ कर पाऊँगी
    ना हिय से उसे भुलाऊंगी
    __________ कभी प्रज्ञा जी की भावुक रचना, उत्तम अभिव्यक्ति

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