माफ़ करना मेरी आदत है, इसमें दो मत नहीं।
मैं बदला नहीं, बदला लेना मेरी फ़ितरत नहीं।
मैं जहाँ था वहीं हूँ, मैं वही हूँ और वही रहूँगा,
लिबास की तरह बदलने की मेरी आदत नहीं।
मैं कभी सूख जाऊँ या फिर कभी सैलाब लाऊँ,
गहरा समंदर हूँ, मुझमें दरिया सी हरकत नहीं।
शजर की झुकी डाल हूँ, पत्थर मारो या तोड़ लो,
फल ही दूँगा, बदले में कुछ पाने की हसरत नहीं।
आज कल मिलते हैं लोग, यहाँ बस मतलब से,
बगैर मतलब मिलने की, किसी को फुर्सत नहीं।
देवेश साखरे ‘देव’
शजर- पेड़
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