खुशहाल रहे हर कोई कर सकें तुम्हारा बन्दन।
महक उठे घर आँगन, हे नववर्ष! तुम्हारा अभिनन्दन।।
दमक उठे जीवन जिससे
वो मैं मलयज, गंधसार बनूँ !
उपवास करे जो रब का
उस व्रती की मैं रफ़्तार बनूँ !
सिंचित हो जिससे मरूभूमि
उस सारंग की धार बनूँ !
दिव्यांगता से त्रस्ति नर के
कम्पित जिस्म की ढाल बनूँ !
मैं, मैं ना रहूँ,
हारे- निराश हुए मन की,
आश बनूँ !
बिगत वर्ष में में
जिनका अबादान मिला
कृतज्ञता ज्ञापित,
उनकी मैं शुक्रगुजार बनूँ!
मुकाम कैसा भी आये
पर मन में थकान न आये
हे ईश! हर मुश्किल में
संभलने का समाधान बनूँ!
मैं, मैं न रहूँ !
Comments
10 responses to “मैं, मैं न रहूँ !”
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“रफ़्तार”
भूलवश
“अफ्ताऱ”
पढ़ा जाये । -
बहुत सुन्दर रचना, उत्तम अभिव्यक्ति
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बहुत बहुत धन्यवाद
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सुंदर भाव
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बहुत बहुत धन्यवाद
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Very nice
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बहुत बहुत धन्यवाद
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“महक उठे घर आँगन, हे नववर्ष! तुम्हारा अभिनन्दन।।
दमक उठे जीवन जिससे”
बहुत सुंदर पंक्तियां , बहुत सुंदर कविता-

बहुत बहुत धन्यवाद गीता जी ।
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bahut suder kavita
suman jee
दमक उठे जीवन जिससे
वो मैं मलयज, गंधसार बनूँ !
उपवास करे जो रब का
उस व्रती की मैं रफ़्तार बनूँ !
सिंचित हो जिससे मरूभूमि
उस सारंग की धार बनूँ !
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