मोहब्बत

तुझे तराशकर फिर कुछ और मैं तराश न सका,
तेरे चेहरे के सिवा आँखों में मैं कुछ उतार न सका,

बड़ी मशक्कत लगी मुझको तुझको बनाने में मगर,
तेरी रगों में मोहब्बत के रंग मैं उतार न सका।।
राही (अंजाना)

Comments

One response to “मोहब्बत”

  1. राम नरेशपुरवाला

    Good

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