कविता- मोह छोड़ कर थप्पड़ मारो
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मां मुझको
चलना सिखा दे,
डगमग करते पैर मेरे
अंगुली पकड़ के राह दिखा दे,
बहुत बड़ी गलती किया हूं,
सभ्यता संस्कारों को भूल गया हूं,
आदर्शों से मुंह मोड़ हूंँ,
मां!इंसान नहीं शैतान बना हूं,
तेरे हर थप्पड़ को भूल गया हूं,
आ कान पकड़कर थप्पड़ मार,
पास बैठा कर हर बात बता,
संस्कारों का मन में दीप जला,
परमारथ की बात सीखा का,
जन नायक राष्ट्र नायक,
वीर पुरुष की कथा सुना,
रोज उठकर दादा दादी का,
घर के सभी बड़े, बुजुर्गों का,
सुबह शुबह प्रणाम करने की बात सिखा,
घर का काम करूं,
खेती बाड़ी का ध्यान रखूं,
पशुओं का भी ख्याल रखूं,
कुल समाज रिश्तेदारों का सम्मान करु,
ना किसी से करूं झगड़ा,
ऐसी मुझको बात सिखा,
बड़ी नादानी कर बैठा हूं,
दारू पीकर नाली में गिर गया हूं,
हालत मेरी ऐसी है,
कुल की इज्जत धो चुका हूंँ,
मां मेरी तुम वैद्य बनो,
नशा मुक्ति की दवा बनो,
मोह छोड़कर थप्पड़ मारो,
मेरी जीवन की राह बनो
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✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’-
मोह छोड़ कर थप्पड़ मारो
Comments
3 responses to “मोह छोड़ कर थप्पड़ मारो”
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अतिसुंदर
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मां मुझको
चलना सिखा दे,
डगमग करते पैर मेरे
अंगुली पकड़ के राह दिखा दे,
_________ माॅं की ममता पर आधारित बहुत सुंदर रचना -

वह मां के ऊपर बहुत ही सुंदर पंक्तियां
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