पूर्व की हवाएँ
जब भी बदलता है मौसम
वसंत के बादऔर ग्रीष्म के पहले
का लंबा अंतराल
तो सूर्य के विरुद्ध जा कर
पुरबवैयाँ चलती हैं।
गाँव में कहावत है
ऐसे मौसम में
मत सोया करो बाहर
ये पूरब की हवाएँ हैं ना
पुराने दर्द उभार देती हैं
इन हवाओं की सरसराहट सुगंध
पिछली यादों में घोल देती हैं।
कहा जाता है इन हवाओं में
सूखे पुराने यादों के पत्ते उड़ कर
हमारे ही आँगन में जमा हो जातें हैं
उन पत्तों की महक को ढकेलती हुई
घुसजातीं है हमारे ही चौखट
ये पूरब की हवाएँ
रात में किसी पुरानी धुन
सी घुस जातीं हैं ये हवाएँ
भूली यादों को फिर याद
दिला जातीं है ये हवाएँ।
हम कहते रह जातें है
अच्छा नहीं लग रहा
क्यूंकी मौसम बदल रहा है
मगर सच तो यह है
इन हवाओं में घुल कर
तू खुद बदल रहा है।
बच कर रहना
पूरब की हवाएँ हर साल आतीं हैं
पुराने दर्द उभार जातीं हैं
~अम्बरीश शुक्ला
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