बचपन में जब मैं रोती थी,
तो हंसाते थे मुझे लोग
चलते समय जब गिरती थी,
तो उठाते थे मुझे लोग
अब बड़ी हो गई हूं तो,
हंसती हुई को रुलाते हैं
चलती हुई को गिराते हैं
रोती को हंसाने वाले,
अब भी हैं, वो मेरे अपने
कभी चलते हुए गिर जाऊं,
तो उठाने वाले
अब भी हैं, वो मेरे अपने
हंसते हुए को जो रुलाए,
उठते हुए को जो गिराए
वो अपने नहीं,
वो तो होते हैं पराए
यही तो जीवन है…
जितनी जल्दी कोई समझ जाए
_____✍️गीता
यही तो जीवन है..
Comments
8 responses to “यही तो जीवन है..”
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भाव का सरलीकरण कवि गीता जी का महत्वपूर्ण गुण है। उन्होंने अपनी इस कविता में अत्यंत सरस और विषयानुकूल शब्दों का चयन किया है। “यही तो जीवन है…
जितनी जल्दी कोई समझ जाए” में अनुप्रास का अलंकरण किया गया है। कविता में व्यक्त कवि की संवेदना आम जीवन से जुड़ी संवेदना है, जो यह बताती है कि कौन अपना है, कौन पराया है। यह कविता समाज को सही गलत का भेद समझने की ओर प्रेरित करने में सक्षम है।-
कविता की बहुत ही सुन्दर व्याख्या की है सर आपने । धन्यवाद हेतु शब्द कम पड़ रहे हैं। इतनी सुन्दर और प्रेरणा दायक समीक्षा हेतु आपका हार्दिक धन्यवाद सतीश जी । बहुत-बहुत आभार सर
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अति उत्तम रचना
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बहुत-बहुत धन्यवाद पीयूष जी
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अतिसुंदर भाव पूर्ण रचना
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समीक्षा हेतु सादर धन्यवाद भाई जी🙏
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अति सुन्दर 👌👌
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धन्यवाद ऋषि जी
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