**हे मनुज**

*****हे मनुज*****
अपनी मेहनत से जो मिले,
उसमें ही तेरा दिल खिले
बढ़ते-चढ़ते देख किसी को,
कभी नहीं किसी का दिल जले
दूजे का हिस्सा ना खाऊं मैं,
निज मेहनत का ही पाऊं मैं
रहे सदा यही भावना
प्रभु से है यही कामना
स्वार्थ भाव मिट कर ,
प्रेम पथ का विस्तार हो
ना रहें किसी से शिकवे-गिले
ऐसा सुन्दर व्यवहार हो,
मेरे हक़ का भी ना ले कोई,
बस, मेरे हिस्से का मुझे मिले
_____✍️गीता

Comments

4 responses to “**हे मनुज**”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    बहुत खूब
    बहुजन हिताय बहुजन सुखाय की भावना को परिलक्षित करती सुंदर सी रचना

    1. Geeta kumari

      सुंदर समीक्षा हेतु बहुत-बहुत धन्यवाद भाई जी🙏

  2. Satish Pandey

    कवि गीता जी की, बहुत सुन्दर रचना है यह, कविता में बेहतरीन प्रवाह है। स्नेह का भाव है, कविता कवि के अंतस से प्रस्फुटित है। प्रेरणात्मक शैली है। यह कविता किसी भी तरह के बनावटीपन से दूर अपने सच्चे रूप में दिखाई देती हैं। विचारों का स्वरूप जीवन दर्शन में बहुत सुंदरता से ढला है। बोधगम्य व सर्वग्राह्य भाषा है। बहुत खूब

    1. Geeta kumari

      इतनी सुंदर समीक्षा से मेरा मन प्रफुल्लित हो गया है सतीश सर, आपने कविता के भावों को बहुत अच्छे से समझा उसके लिए आपका हार्दिक धन्यवाद । आपकी समीक्षाओं से एक कवि को बहुत ही प्रेरणा मिलती है। अभिवादन है सतीश जी

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