लिखेगी लेखनि कौन सा अक्षर
स्याही के रंग क्या होंगे–?
लफ़्जें कहेंगी कहानी कौन सी
कथाओं में उमंग क्या होंगे—?
झलकेगा इनमें कौन सा रूप
झूठ बोलेगा,सच होगा चुप
उपहासें या खिलखिलाहटें
हँसी के रंग क्या होंगे—?
फ़सानें-अफ़सानें हज़ार बातें
मुद्दों का मसला नज़र नहीं आता
किसलिए ये भागमभाग है मची
कोई फ़ैसला नज़र नहीं आता
तो,समय के रंग क्या होंगे—?
ज़िन्दग़ानी ऐसी,सबब क्या–
वक़्त मानो गुज़ार रहें हैं
धर्म कहीं और कर्म कहीं
पता नहीं लोग कहाँ जा रहें हैं
तो,तहज़ीब के रंग क्या होंगे–?
भेद पता नहीं—
भौतिकता और यथार्थ में
किसे छोड़ रहे,अपनाते किसे हैं
स्वार्थ का मेल हो रहा हो जहाँ
तो,प्यार के रंग क्या होंगे—?
छिनना,बटोरना, पा लेना
है आसान बहुत इस जहाँ में
लुप्त हो रही मानवता —
“मतलब”के संकीर्णता में जकड़े
फिर,भावों के रंग क्या होंगे—?
रंगीन होते मुखड़े सबके
दिल फिर भी रंगहीन है
उदासीन है रिश्तों की हँसी
मुस्कुराहट भी ग़मगीन है
तो,बंधनों के रंग क्या होंगे–?
प्यार की बातें सिर्फ़ ज़ुबाँ पर
किसने अर्थ को जाना है–?
शाश्वतता और पवित्रता इनकी
किसनें अबतक पहचाना है–?
बनावटीपश और दिखावटीपन
फिर,समर्पण के रंग क्या होंगे–?
रंग भी शर्मशार रंग को.जानकर
छुट रहे रंग,सभी रंग के
हैं सभी उदासीन,बनकर मशीन
एहसास,क़शिश और प्रेम बिना
जीवन के रंग क्या होंगे—??
——-रंजित तिवारी “मुन्ना”
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